ऐसे शुरू करें बकरी पालन व्यवसाय || How to Start Goat Farming Business?

Goat Farming Business in India: जैसा की सभी जानते हैं कि हमारे देश में हमेशा से ही कृषि कार्य को प्राथमिकता और महत्व दिया जाता है। इसके साथ ही हमारे देश में पशुपालन को भी बहुत महत्व दिया गया है। कुछ लोग शौक में पशुओं को पालते हैं और कुछ लोग आजीविका के लिए पशुओं को पालते हैं। आंकड़ों को देखा जाये तो हमारे देश में कुल पशुओं में से तकरीबन 25.6% बकरियां है। इससे यह ज्ञात होता है कि देश में ज्यादातर लोग बकरी पालन करते हैं। इसके अलावा नए लोग भी इस व्यवसाय से जुड़ते रहते हैं।

बकरी पालन ()से कई तरह से लाभ अर्जित किया जाता है जैसे कि मांस (मीट), दूध, रेशा तथा खाल इत्यादि और सभी जानते हैं कि इन सभी चीजों की मांग बाजार में हमेशा की जाती है, जिसके कारण रोजाना इन चीजों की आपूर्ति कर पाना मुश्किल हो जाता है। इसी कारण इन चीजों के मूल्यों में दिनों दिन बढ़ोतरी हो रही है। इसके अलावा पहाड़ी या ग्रामीण क्षेत्रों में लोग हल्के-फुल्के सामान ढोने का काम भी बकरियों से करवाते हैं। कृषि कार्यों के अलावा बकरी पालन में भी पशुपालक को ज्यादा धन लाभ प्राप्त होता है। इसलिए कोई भी व्यक्ति बकरी पालन का चयन आर्थिक स्रोत के रूप में भी कर सकते हैं।

Goat Farming in India: सरकार की तरफ से मिलने वाली सहायता

केंद्र सरकार की ओर से कृषि क्षेत्र में खेती और किसानों के हित में और साथ ही पशुपालन को अधिक महत्व देने के लिए भी कई प्रकार की योजनाएँ चलाई जाती हैं। ये योजनायें राज्य एवं केंद्र स्तर पर अलग -अलग तरह से चलाई जाती हैं। इसी प्रकार से हरियाणा राज्य सरकार द्वारा मुख्यमंत्री भेड़ पालक उत्थान योजना चलाई जा रही है। इसलिए आप भी अपने राज्य में चल रही इस तरह की लाभकारी योजनाओं का पता लगा कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा इच्छुक व्यक्ति नाबार्ड में आवेदन देकर नाबार्ड की ओर से भी ऋण और सब्सिडी जैसी आर्थिक मदद प्राप्त कर सकते हैं।

Benefits of Goat Farming in Hindi

बकरी पालन के लिए कम लागत और कम जगह की जरूरत होती है। यह व्यवसाय निश्चित आय पर निर्भर है। नुकसान की भी संभावना कम है। चूंकि बकरियां आकार में छोटी और स्वभाव से शांत होती हैं, इसलिए घर की महिला सदस्य भी इनका पालन कर सकती हैं। यह परिवार के श्रम का भी पूरा उपयोग करता है। बकरियों के रोग भी अपेक्षाकृत कम होते हैं यदि उचित सावधानी बरती जाए। चाहे वह कमजोर वर्ग हो या भूमिहीन, बकरी पालन उनकी आजीविका का मुख्य स्रोत है। इसी कारण बकरी को ‘गरीबों की गाय’ भी कहा जाता है। बकरियों को चरने के लिए खुले चारागाह में भी ले जाया जा सकता है, जिससे उनके पालन-पोषण की लागत बहुत कम हो जाती है। कहने का अर्थ यह है कि एक गाय या भैंस को पालने के खर्च में चार या पांच बकरियां उस खर्च में उठेंगी, इसलिए इसे हर वह व्यक्ति शुरू कर सकता है जिसके पास व्यापार करने के लिए ज्यादा पैसा नहीं है।

वास्तव में, बकरियों को ज्यादातर मांस के लिए ही पाला जाता है। भारत में इनकी बहुत मांग है। बाजार में बकरी के मांस की बहुत मांग और कीमत है। इसका मांस खाने में टेस्टी और पौष्टिक होता है। एक आंकड़े के अनुसार, भारत में उत्पादित कुल मांस का एक-तिहाई हिस्सा बकरी के मांस का है।
दूध के उत्पादन के लिए बकरी को भी पाला जाता है। जमुनापारी, बरबरी और भृंग नस्लों की बकरियां भारत में दूध उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। भारत में कुल दुग्ध उत्पादन में बकरी की हिस्सेदारी 3% है।
बकरी का दूध आसानी से पच जाता है, इसे बीमारों और बच्चों को भी दिया जा सकता है। कई बार बच्चों को गाय के दूध से एलर्जी हो जाती है। लेकिन बकरी के दूध से एलर्जी होने की घटना बहुत कम होती है।

चमड़ा उद्योग में बकरी के चमड़े का उपयोग कच्चे माल के रूप में किया जाता है। इससे कई चीजें बनती हैं। जैसे जूते, दस्ताने, जैकेट, फैंसी बैग आदि। हमारे देश भारत को चमड़े का निर्यात करके आर्थिक लाभ मिलता है। पश्चिम बंगाल की ‘ब्लैक बंगाल’ (ब्लैक बंगाल) नस्ल का चमड़ा विश्व विख्यात है।
विभिन्न नस्लों की बकरियों में अलग-अलग प्रकार के रेशे होते हैं। साधारण बकरियों के रेशे से रस्सियाँ, कंबल आदि तैयार किए जाते हैं। अंगोरा बकरियों से प्राप्त मोहर और छग और छगंडे नस्लों से प्राप्त पश्मीना ऊन का उपयोग उच्च गुणवत्ता वाले और मूल्यवान ऊनी कपड़े तैयार करने के लिए किया जाता है, इन वस्त्रों का विदेशों में भी निर्यात किया जाता है।
बकरी पालन से उत्पन्न बकरी के मल और मूत्र को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें मौजूद नाइट्रोजन, पोटाश और फास्फोरस मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखते हैं।

बकरियों का आकार छोटा होने के कारण उनके मवेशी शेड तैयार करने में कम जगह लगती है। और खर्चा भी कम होता है।
बकरियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अन्य जानवरों के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती है। इसलिए, वे बीमारियों के प्रति कम संवेदनशील होते हैं और मृत्यु दर कम होती है।
उनकी डाइट को मैनेज करने में कोई दिक्कत नहीं होती है। क्योंकि जब उन्हें विस्तारित प्रणाली यानी अन्य जानवरों के साथ पाला जाता है तो उनके भोजन पर ज्यादा खर्च करने की जरूरत नहीं होती है। आम तौर पर ये घास, बेल के पत्ते, गाय और भैंस चरने के बाद बची हुई छोटी घास, झाड़ियां, छिलके या सब्जियों और फलों आदि के टुकड़े खाते हैं। अतः बकरी उद्योग में आय (आय) सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न पहलुओं पर विशेष ध्यान देना आवश्यक हो जाता है जैसे बकरी पालन में वैज्ञानिक आहार खिलाना, रोग प्रतिरोधक प्रणाली अपनाना।

बकरी पालन पंजीकरण की प्रक्रिया: How to Start Goat Farming Business?

  • यदि कोई व्यक्ति पशुपालन के लिए इच्छुक है और कोई फर्म खोलना चाहते हैं तो उन्हें अपने फर्म का पंजीकरण MSME या उद्योग आधार की ऑफिसियल वेबसाइट के माध्यम से करना होगा।
  • उद्योग आधार के अंतर्गत आप अपनी फर्म का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं और इसके लिए आपको सबसे पहले उद्योग आधार की ऑनलाइन वेबसाइट udyogaadhar.gov.in पर जाना होगा।
  • उसके बाद आपको अपना आधार नंबर और नाम दर्ज करना होता है।
  • इसके बाद आपको Validate aadhar पर क्लिक करना होगा और फिर आपका आधार validate हो जाता है।
  • इसके बाद खुले नए पेज पर आपको अपना नाम, फर्म/कंपनी का नाम, कंपनी का पूरा पता, राज्य का नाम, जिला, पिन नंबर, अपना मोबाइल नंबर, e-mail id, बैंक डिटेल, एनआईसी कोड आदि जानकारी भरनी होती है।
  • अब आपको captcha code दर्ज करके सबमिट बटन पर क्लिक कर देना है।
  • इस पूरी प्रक्रिया के बाद आपको MSME के द्वारा एक सर्टिफिकेट प्रदान किया जाता है और आप इस सर्टिफिकेट का प्रिंटआउट निकलवा कर अपने ऑफिस में लगा सकते हैं।
pmkisanyojanaa Home PageClick Here

Leave a Comment